Sai Kripa Ki Paawan Smritiyan

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Author - Late Shri Suresh Chandra Gupta | Language - Hindi

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Descriptions

पिछले २० या इसके आस पास वर्षोमें, जैसे जैसे अधिक से अधिक व्यक्ति शिरडी के महान संत की और आकर्षित होते आ रहे है, दिल्ली के बाबा के अनेक भक्तों ने मुझ से अनुरोध किया है कि मै 'बाबा दिल्ली कैसे पधारे' की गाथा लिखित में छोड़ दूँ , जिससे कि बाबा के वर्त्तमान तथा भविष्य में होने वाले भक्त लाभान्वित हो सके।  जब जब मै ने ऐसा करने का प्रयास किया और गाथा को  बढ़ाया, मेरे मन में सदा यह विचार उत्पन्न हुआ कि "मैं किस के लिए यह गाथा लिखना चाहता हूँ ? जिसको यह मालुम होना चाहिए, वह (बाबा ) एस सबसे पहले ही भली भांति परिचित हैं।  अन्य लोगों को इसे जानने से क्या लाभ होगा ?" बाबा के कुछ भक्तों के लगातार आग्रह पर तथा बाबा की परम कृपा से ही अब मैं इन तथ्यों को लिखने का प्रयास कर रही हूँ।  ऐसा करते हुए, मैं हर कदम पर पूर्णतया सजग रहा हूँ कि क्या यह केवल अहम् हैं जो मुझ से ऐसा करा रहा है, अन्यथा मैं, जितना एक मनुष्य के लिए सम्भव है, पूरी दास्तान पूर्ण सत्यता से बया कर रही हूँ।  मैं तो केवल अपने बाबा से ही प्रार्थना कर सकता हूँ कि ऐसा करने में वह मुझे अपने अहम् को दूर रखने की सामर्थ्य दे और केवल तथ्यों को यथा सम्भव सच्चाई और ईमानदारी से, मुझसे उद्धरित कराये।  यदि मैं किसी कदम पर भी अपने प्रयास में असफल रहा हूँ तो मैं इसका कारण मानव दुर्बलता ही समझूंगा और अपने बाबा तथा आप सब पाठकों से इसके लिए क्षमा याचना करूंगा।

यह कहना तो मेरी कोरी धृष्टता होगी कि बाबा के कार्य की दिल्ली में नींव उस दिन राखी गई जब जयपुर के श्री याज्ञनिक, एक साई भक्त, ने मुझे ऐसा करने की प्रेरणा देकर अपने घर से बाहर निकल कर बाबा का सन्देश फैलाने का आदेश दिया तथा दिल्ली में साई भक्तों को एक मंच पर एकत्रित करने का कार्य सोंपा। इस से पहले भी बाबा की पूजा कुछ गिने चुने भक्तों द्वारा अपने-अपने घर में, की जा रही थी और भविष्य में भी उसकी पूजा अर्चना सदा चलती रहेगी, जब मेरे जैसे पानी के बुलबुलों का अस्तित्व भी कही नहीं रहेगा।  आज, मेरा अटल विश्वास है कि बाबा अपना कार्य स्वयं ही करते हैं और उसे करने के लिए गुरुओं तथा एजेंटों की आवश्यकता नहीं है।  अपनी अज्ञानता के कारन ही हम अपने प्रयासों पर फूले नहीं समाते और भूल जाते हैं कि बगैर उसकी आज्ञा के घास का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।  बाबा ने अपने जीवन काल में ही कहा था कि वे अपने भक्तों को अपनी और इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे कि एक चिड़िया को उअसके पैर में रस्सी बांध कर खींच लिया जाता है।

जब मैंने बाबा की राह पर चलना शुरू किया, उस समय उत्तर भारत में बाबा के विषय में गिने चुने व्यक्ति ही उनके बारे में जानते थे।  दिल्ली में बाबा की एक छोटी सी तस्वीर भी कहीं उपलब्ध नहीं होती थी, श्री साई सतचरित्र का तो कहना ही क्या।  आज मैं बाबा की तस्वीरें दोपहिया वाहनों, कारों, बसों पर चिपकी हुई देखता हूँ और सहस्त्रों भक्तों को न केवल दिल्ली में, अपितु पूरे उत्तर भारत में नए और निरंतर बनाते चले आते मंदिरों की और लपके चले आते देखता हूँ तो तनिक सोचिए, मुझसे अधिक प्रसन्नता और किसे हो सकती है ? यह सब बाबा की कृपा के फल स्वरुप ही है।  मुझे ऐसा अहसास होता है कि मैंने अध्याय चार में साई भक्ति के विभिन्न स्वरूपों सम्बंधित शीर्षक के अंतर्गत व्यक्त किए अपने विचारों में कुछ थोड़े कठोर शब्दों का प्रयोग कर दिया है।  मैं भली भांति जानता हूँ कि एक भक्त को आलोचना करने से सदा बचना चाहिए।  मैं अपने पाठकों को आश्वासन देता हूँ कि मैं ने जो कुछ भी लिखा है बाबा के रस्ते पर चलते हुए अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिखा है और ऐसा करने से मेरा उद्देश केवल इतना भर है कि हम सब भक्तगण बाबा के स्वयं के जिए  जीवन में दिखाए मार्ग पर ही चलते रहें और उस में आज जो अपभ्रान्ति दिखाई देने लगी है, उससे बचते रहें।  दुर्भाग्यवश बाबा के नाम पर ऐसा कोई मंच नहीं है जो दिन प्रतिदिन बढ़ती साई भक्तों की संख्या का सही मार्ग दर्शन कर सके, विशेषकर उत्तर भारत में।  एक व्यक्ति जब बाबा की कृपा का अनुभव किसी रूप में भी करता है और बाबा की और आकर्षित होता है तो या तो वह अपने आस पास के भक्तों का अनुसरण करने का प्रयत्न करता है, अन्यथा किसी गुरु का दामन थाम लेता है जो उसे बाबा का सही रास्ता दिखाने के बजाए अपनी ओर खींच लेता है।  मैं तो ऐसे विदेशियों के संपर्क में भी आया हूँ जो बाबा को फटी पुरानी कफनी पहने, आँखों में असीम करुणा भरे, एक पत्थऱ पर बैठी तस्वीर को देखकर उसकी ओर आकर्षित हुए और जिनके मन में यह जानने की जिज्ञासा जाग्रित हुई हैं कि " बाबा कौन थे, उन के सिध्दांत क्या थे " इत्यादि और उन्हें अपने प्रश्नों का उपयुक्त उत्तर नहीं मिल पाया  है।  मेरे विचार से एक ऐसे संगठन की अत्याधिक आवश्यकता है जो बाबा सम्बन्धी सही मार्गदर्शन न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में कर सके और भक्तों में बाबा के आदर्श तथा सिध्दांतों की जाग्रति पैदा कर सके।

अपनी इस कहानी को लिखने की  प्रेरणा देने तथा लोदी रोड मंदिर का सचिव पद छोड़ने के उपरांत एकांतवास  में चले जाने पर उससे निकालने का श्रेय मेरे साथी भक्त श्री मोतीलाल गुप्ता संस्थापक अध्यक्ष, शिरडी साई बाबा टेम्पिल सोसाइटी, साईं धाम, तिगाव रोड, फरीदाबाद (हरियाणा) को जाता है।  वास्तव में तो इनके निरंतर प्रेरित करने से और बाबा की कृपा से ही, मेरी इस अंग्रेजी रचना का प्रकाशन होना सम्भव हुआ है।

१७ अगस्त, २००२ सुरेश चन्द्र गुप्ता
दिल्ली - ११००१०


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