Sai Bhakti Ke Path Par

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Author - Late Shri Suresh Chandra Gupta | Language - Hindi

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Descriptions

अपनी बात
 मेरे प्यारे साई भक्तो,

 कृपया मेरा नतमस्तक प्रणाम स्वीकार करें।

हम बहुत भाग्यशाली हैं जो हम अपने जीवन में साई कृपा की अनुभूति कर पाये हैं।  जीवन के किसी मोड़ पर भी, जब हमें  आगे की दिशा दृष्टिगोचर नहीं होती, हम संशय में फँस जाते हैं, एक अज्ञात हाथ कहीं से आकर, हमें हमारे लिए उपयुक्त राह दिखा देता है।  यह हाथ किसी और का नहीं, हमारे साई प्रभु का ही होता है।  हम उसे पहचाने और बाबा की कृपा को जीवन में उतारने का प्रयास करें।

मैं, एक छोटासा साई भक्त,  जो आज भी बाबा के वास्तविक स्वरुप को जानने की प्रकिया में संलग्न है, ८०  वर्ष की दीर्घ आयु में, जिसमें से लगभग ४३ वर्ष तो बाबा के नाम से जुड़े रहे ही हैं, इस पुस्तक में उद्धारित विचारों द्वारा, आपके पास पहुँचने का प्रयास कर रहा हूँ।  ऐसा मैं अपनी भक्ति का, अपने ज्ञान का, अपनी विद्वता का परिचय देने की चेष्टा से नहीं कर रहा  - मुझे अपनी लघुता का, अपनी सीमाओं का, पूर्णतया अहसास है ; मेरा तो केवल एक ही गंतव्य है : मेरे बाबा की दिखाई राह वैसी ही शुद्ध, सात्विक, सरल एवं  सहज बनी रहे, जैसी उसने पृथ्वी पर अपना स्वयं का जीवन जीकर, दिखाई थी।  उस में दिन दूनी रात चौगनी हो रही बाबा भक्तों की संख्या में वृद्धि के कारण कोई अशुद्धता, अपभ्रशंता अथवा असरलता ना आने पाए।  मैं जानता हूँ आज के बदलते वातावरण में जब देश विदेश में जगह जगह, बाबा के नए नए मंदिर बनाते चले आ रहे है और बाबा के तथाकथित पथ प्रदर्शकों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोत्री होती जा रही है, इस शुध्दता को बनाए रखना अत्यंत कठिन कार्य है।परन्तु इसके लिए प्रयन्त करते रहना हमारा कर्तव्य है।  प्रस्तुत पुस्तक में अपने अनुभवों के आधार पर मैंने बाबा सम्बन्धी कुछ गहन विचार एवं तथ्य, जितना मैं इस विषय पर अब तक जान और समझ सका हूँ, भक्तों के सम्मुख रखने का प्रयत्न किया है।  इनको पढने से हो सकता है कि भक्तगण स्वयं निश्चित कर सकें कि उन्हें बाबा की राह पर कैसे अग्रसर होना हैं।  इस प्रयास से मुझे अपने गंतव्य को प्राप्त करने मैं कितनी, क्या सफलता मिलेगी, बाबा जाने।  मेरा उद्देश अपने शब्दों द्वारा किसी व्यक्ति अथवा वर्ग विशेष की आलोचना करने का नहीं है परन्तु फिर भी यदि मेरा लिखा कोई शब्द किसी को भी अप्रिय लगे, तो मैं सविनय क्षमा प्रार्थी हूँ।

बाबा ने अपने जीवन काल में कहा था: "मेरे भक्त मुझ से जो माँगते हैं, मैं उन्हें पहले इसलिए  देता हूँ, जिससे वह  चलकर मुझसे वह माँगे, जो मैं उन्हें देना चाहता हूँ ". निश्चित ही बाबा का इशारा उनकी प्रवृत्ति को ब्रह्म ज्ञान की ओर मोड़ने का है।  गहन चिंतन के पश्चात मेरा दृढ़ विश्वास होता जा रहा है कि साई एक अथाह सागर है जिसमें सहत्रों बार डुबकी लगाने पर भी, उसके धरातल पर बिखरे हीरे मोती चुनने में हम असमर्थ रहते है।  होता यह है कि राह में पड़े चमकते पत्थरों को ही हीरे मोती समझकर हम उनकी चमक दमक में खो जाते है और व्यापारी बन बैठते हैं।  यदि हमारी इच्छा साई के वास्तविक स्वरूप को खोजने की है, तो हमें धरातल तक जाना ही होगा। हो सकता है ऐसा करने में हमें अनेक जन्म लग जाये।

प्रिय बंधुओं, हमें बाबा को गहराई से जानने और समझने का प्रयास निरंतर करते रहना होगा। हम उसे अपने मन और मस्तिष्क की गहराइयों में उत्तर लें।  न स्वयं को भ्रमित होने दें और न दूसरों को करें। निर्मल, निश्चल एवं सहज मन से बाबा को अपनाए और जीवन के हर मोड़ पर बाबा के द्वारा दिखाई गई दिशा की सहायता से एक स्वच्छ, स्वस्थ, सरल एवं आदर्श जीवन जीने का प्रयत्न करें।  ऐसा करने से हम स्वयं भी जीवन में सुखी रहेंगे और बाबा के नाम की चमक को भी बनाए रखेंगे। युग युगांतर तक साई नाम की सुगन्ध चहुँ ओर महकती रहेगी। हमारा उसका भक्त कहलाने का दावा भी सार्थक हो सकेगा।  मैं आपसे अधिक कुछ न कहकर, आपके भक्त जीवन के अनुभवों पर आधारित आपकी प्रतिक्रया की प्रतीक्षा करूंगा।

इस पुस्तक को आप तक पहुचाने में श्री मोती लाल गुप्ताजी संस्थापक अध्यक्ष, शिर्डी साई बाबा टैम्पल सोसायटी फरीदाबाद, बाबा की अनन्य भक्त श्रीमती अलका वाधवा ( नई दिल्ली ) एवं मेरे पड़ौसी बिग्रेडियर (रि.) नाथू  सिंह का अथक सहयोग सराहनीय है।  मैं उनका ह्रदय से आभारी हूँ और साई प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि उसका वरद हस्त सदा इन सभी पर बना रहे और वे जीवन पर्यन्त साई सेवा में रत रहें।

निखिल आफसैट प्रेस, नई दिल्ली के संचालक श्री नरेश सरपाल और उनकी धर्म पत्नी श्रीमती सीमा सरपाल विशेष धन्यवाद के  पात्र हैं, जिन्होंने इस पुस्तक का नि:स्वार्थ एवं सुचारु रूप से प्रकाशन कार्य संपन्न किया है।  बाबा से प्रार्थना है कि वह इन्हें  अपनी सेवा करने की अधिकाधिक सामर्थ्य दे और उनका हर प्रकार से कल्याण करे।

श्री सच्चिदानन्द सदगुरु साई नाथ महाराज की जय।

दास
नई दिल्ली
रामनवमी सुरेश चन्द्र गुप्ता
30 मार्च, 2004


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